हंसी सबसे उत्तम औषधि: प्रधानमंत्री मोदी ने संस्कृत सुभाषित के जरिए दिया सकारात्मक जीवन का संदेश
नई दिल्ली, 4 फरवरी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर भारत की प्राचीन सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपरा को आधुनिक जीवन से जोड़ते हुए देशवासियों को सकारात्मक सोच और स्वस्थ जीवन का संदेश दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक संस्कृत सुभाषित साझा करते हुए हंसी को सबसे प्रभावी और सहज औषधि बताया, जो न केवल स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है बल्कि जीवन में आनंद और संतुलन भी बढ़ाती है।
प्रधानमंत्री द्वारा साझा किया गया सुभाषित है—
“औषधेष्वपि सर्वेषु हास्यं श्रेष्ठं वदन्ति ह।
स्वाधीनं सुलभं चैवारोग्यानन्दविवर्धनम्॥”
इस श्लोक का भावार्थ बताते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से साझा वीडियो में कहा गया कि सभी औषधियों में हंसी को सर्वोत्तम औषधि माना गया है, क्योंकि यह सहज रूप से उपलब्ध है, पूरी तरह निःशुल्क है और शरीर के साथ-साथ मन के स्वास्थ्य एवं आनंद को भी बढ़ाती है। इस संदेश के साथ प्रधानमंत्री ने लोगों से मुस्कुराते रहने और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया।
हंसी और स्वास्थ्य का गहरा संबंध
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, हंसी केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक प्रभावी प्राकृतिक चिकित्सा भी है। हंसने से तनाव हार्मोन कम होते हैं, रक्त संचार बेहतर होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूती मिलती है। प्रधानमंत्री मोदी का यह संदेश ऐसे समय में सामने आया है, जब मानसिक तनाव, अवसाद और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इस संदर्भ में उनका यह सुभाषित लोगों को सरल उपाय के माध्यम से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने की प्रेरणा देता है।
संस्कृत सुभाषित और आधुनिक संदर्भ
प्रधानमंत्री मोदी बीते कुछ वर्षों से संस्कृत सुभाषितों के माध्यम से प्राचीन भारतीय ज्ञान को समकालीन जीवन और नीति-निर्माण से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। दिसंबर 2025 से उन्होंने नियमित रूप से प्रेरणादायक श्लोक साझा करने की पहल की है, जिनका उद्देश्य नैतिक मूल्यों, सकारात्मक सोच और सामाजिक जिम्मेदारी को प्रोत्साहित करना है।
उनके भाषणों, ‘मन की बात’ कार्यक्रम और सोशल मीडिया पोस्ट में अक्सर ऐसे सुभाषित देखने को मिलते हैं, जो विकास, सुशासन, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, महिला सशक्तिकरण और नैतिक नेतृत्व जैसे आधुनिक विषयों को सरल और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
सभ्यतागत ज्ञान से शासन का जुड़ाव
प्रधानमंत्री का मानना है कि भारत की सभ्यतागत शक्ति उसके प्राचीन ज्ञान में निहित है। संस्कृत सुभाषितों को सार्वजनिक मंचों पर प्रस्तुत करके वे यह संदेश दे रहे हैं कि आधुनिक शासन केवल तकनीक और नीतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें मानवीय मूल्य, करुणा और संतुलन भी उतने ही आवश्यक हैं।
प्रधानमंत्री ने इससे पहले भी कहा है कि भारत को भविष्य की ओर बढ़ते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहना चाहिए। उनके अनुसार, प्राचीन श्लोक केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि आज की चुनौतियों के समाधान का मार्ग भी दिखाते हैं।
दूरदर्शन और संस्कृत का प्रसार
प्रधानमंत्री मोदी ने 8 दिसंबर को संस्कृत की निरंतर प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए दूरदर्शन के ‘सुप्रभातम’ कार्यक्रम का विशेष उल्लेख किया था। उन्होंने बताया था कि इस कार्यक्रम में प्रतिदिन एक संस्कृत सुभाषित प्रस्तुत किया जाता है, जो भारतीय मूल्यों और संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य कर रहा है।
उन्होंने सोशल मीडिया पर संस्कृत में पोस्ट करते हुए कहा था कि ‘सुप्रभातम’ कार्यक्रम के माध्यम से संस्कार, संस्कृति और समकालीन विषयों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
सकारात्मक भारत की दिशा में संदेश
प्रधानमंत्री द्वारा साझा किया गया यह सुभाषित केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामूहिक सामाजिक दृष्टिकोण को भी दर्शाता है। हंसी, आनंद और सकारात्मकता को जीवन का हिस्सा बनाकर समाज अधिक सहनशील, रचनात्मक और सहयोगी बन सकता है।
आज के तेज़ रफ्तार और प्रतिस्पर्धी दौर में, प्रधानमंत्री का यह संदेश लोगों को रुककर मुस्कुराने, जीवन का आनंद लेने और मानसिक संतुलन बनाए रखने की याद दिलाता है। सरल शब्दों में कहा जाए तो यह सुभाषित हमें सिखाता है कि स्वस्थ जीवन के लिए महंगी दवाओं से पहले सकारात्मक सोच और मुस्कान को अपनाना जरूरी है।
