तमिलनाडु में कैंसर का बढ़ता बोझ: 2025 में पहली बार एक लाख से अधिक नए मामले, स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती
चेन्नई, 4 फरवरी। तमिलनाडु में कैंसर के मामलों में लगातार बढ़ोतरी राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। वर्ष 2025 में पहली बार राज्य में एक लाख से अधिक नए कैंसर मरीज दर्ज किए गए हैं, जो न केवल बीमारी के बढ़ते बोझ को दर्शाता है, बल्कि रोकथाम, शुरुआती पहचान और इलाज की मौजूदा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में तमिलनाडु में कुल 1,00,097 नए कैंसर मामले सामने आए। यह आंकड़ा बीते पांच वर्षों से लगातार बढ़ते ट्रेंड का हिस्सा है और संकेत देता है कि यदि प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
पांच वर्षों में तेज़ी से बढ़े मामले
आंकड़ों पर नजर डालें तो तमिलनाडु में कैंसर के नए मामलों में साल दर साल उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2020 में जहां 68,750 नए मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2021 में यह संख्या बढ़कर 76,968 हो गई। 2022 में 89,265, 2023 में 92,816 और 2024 में 96,486 नए मरीज सामने आए। 2025 में यह आंकड़ा पहली बार एक लाख के पार पहुंच गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह लगातार बढ़ोतरी न केवल बेहतर रिपोर्टिंग और डायग्नोस्टिक सुविधाओं का परिणाम है, बल्कि जीवनशैली में बदलाव, तंबाकू और शराब का सेवन, शारीरिक निष्क्रियता, असंतुलित आहार, प्रदूषण और बढ़ते मानसिक तनाव जैसे कारकों की भी अहम भूमिका है।
महिलाओं में ज्यादा मामले, पुरुष भी पीछे नहीं
2025 में सामने आए नए मामलों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक रही। आंकड़ों के अनुसार, 53,542 महिलाएं कैंसर से प्रभावित पाई गईं, जबकि 46,555 पुरुषों में इस बीमारी का निदान हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं में स्तन और सर्वाइकल कैंसर के बढ़ते मामले इस असंतुलन का प्रमुख कारण हैं।
वर्तमान में तमिलनाडु में कैंसर के साथ जी रहे लोगों की कुल संख्या 1,09,097 बताई गई है। यह आंकड़ा एक ओर बेहतर इलाज और मरीजों की लंबी जीवन-प्रत्याशा को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर दीर्घकालिक उपचार, फॉलो-अप और पेलिएटिव केयर की बढ़ती जरूरत की ओर भी इशारा करता है।
चेन्नई सबसे ज्यादा प्रभावित, शहरी इलाकों में अधिक खतरा
जिलावार आंकड़ों की बात करें तो चेन्नई में सबसे अधिक 8,505 नए कैंसर मामले दर्ज किए गए। इसके बाद कांचीपुरम में 7,295 और वेल्लोर में 6,525 नए मरीज सामने आए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में कैंसर के ज्यादा मामलों के पीछे कई कारण हैं, जिनमें प्रदूषण, तेज़ रफ्तार जीवनशैली, खान-पान की गलत आदतें, तनाव और बीमारी की देर से पहचान शामिल हैं।
ग्रामीण इलाकों में जागरूकता की कमी और स्क्रीनिंग सुविधाओं की सीमित पहुंच भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है, जिसके कारण कई मरीजों में बीमारी का पता काफी देर से चलता है।
जेंडर के हिसाब से अलग-अलग कैंसर पैटर्न
तमिलनाडु में कैंसर के प्रकारों में भी पुरुषों और महिलाओं के बीच स्पष्ट अंतर देखा जा रहा है। पुरुषों में मुंह का कैंसर सबसे आम है, जिसका मुख्य कारण तंबाकू और गुटखा जैसे उत्पादों का सेवन माना जाता है। इसके बाद कोलोरेक्टल और पेट के कैंसर का स्थान आता है।
महिलाओं में स्तन कैंसर सबसे अधिक पाया जा रहा है, जबकि सर्वाइकल और ओवेरियन कैंसर भी बड़ी संख्या में दर्ज हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन कैंसरों को शुरुआती चरण में पहचानने के लिए नियमित स्क्रीनिंग और सामुदायिक स्तर पर जागरूकता अभियान बेहद जरूरी हैं।
देर से पहचान बन रही बड़ी समस्या
मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार, तमिलनाडु में कैंसर के लगभग आधे मामलों का पता एडवांस स्टेज में चलता है। इससे न केवल इलाज की सफलता दर कम हो जाती है, बल्कि मरीजों और उनके परिवारों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ जाता है। देर से पहचान की प्रमुख वजहों में लक्षणों को नजरअंदाज करना, सामाजिक झिझक, आर्थिक सीमाएं और जांच सुविधाओं की कमी शामिल हैं।
मौतों के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में केवल ओवेरियन, ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर से जुड़ी 10,821 मौतें दर्ज की गईं। यह आंकड़ा महिलाओं में कैंसर से होने वाली मृत्यु दर की गंभीरता को दर्शाता है और तत्काल हस्तक्षेप की मांग करता है।
विशेषज्ञों की चेतावनी और आगे की राह
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ये आंकड़े नीति-निर्माताओं और आम जनता दोनों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी हैं। कैंसर के बढ़ते बोझ को कम करने के लिए व्यापक जागरूकता, तंबाकू नियंत्रण, स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा, नियमित स्क्रीनिंग और प्राथमिक स्वास्थ्य स्तर पर शुरुआती जांच को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में तमिलनाडु में कैंसर न केवल एक स्वास्थ्य समस्या बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती बन सकता है।
