आज आरबीआई रेपो रेट पर अहम फैसला: नीतिगत रुख और भविष्य की गाइडेंस पर सबकी नजर
मौद्रिक नीति समिति की बैठक और बाजार की उम्मीदें
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की तीन दिवसीय बैठक के बाद आज देश की सबसे महत्वपूर्ण नीतिगत दर यानी रेपो रेट पर फैसला आने वाला है। दिसंबर 2025 में ब्याज दरों में कटौती के बाद यह पहली बड़ी समीक्षा मानी जा रही है, इसलिए निवेशकों, उद्योग जगत, बैंकिंग सेक्टर और आम उपभोक्ताओं की निगाहें इस घोषणा पर टिकी हुई हैं।
अधिकांश अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस बार केंद्रीय बैंक फिलहाल दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा। इसका कारण यह है कि पिछले दर कट के प्रभाव को अर्थव्यवस्था में पूरी तरह से दिखने के लिए समय देना जरूरी माना जा रहा है। साथ ही, आरबीआई आमतौर पर लगातार और तेज दर कटौती से बचते हुए चरणबद्ध और संतुलित नीति अपनाता है। इसलिए यह बैठक “रेट कट” से ज्यादा “फॉरवर्ड गाइडेंस” यानी भविष्य के संकेतों के लिए महत्वपूर्ण बन गई है।
महंगाई, वृद्धि और वैश्विक कारकों का संतुलन
डीबीएस बैंक की वरिष्ठ अर्थशास्त्री राधिका राव के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था अभी मजबूत वृद्धि के दौर में है और वैश्विक जोखिमों में कुछ कमी आई है। अमेरिका के साथ व्यापार समझौते और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक माहौल में स्थिरता ने नीति निर्माताओं को थोड़ा लचीला रुख अपनाने की गुंजाइश दी है।
हालांकि, महंगाई में गिरावट के बावजूद कुछ ऐसे जोखिम मौजूद हैं जो तुरंत दर कटौती के खिलाफ जाते हैं। इनमें रुपये पर दबाव, विदेशी निवेश का संभावित बहिर्वाह और बैंकों के लिए डिपॉजिट जुटाने की चुनौती प्रमुख हैं। यही वजह है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल इंतजार और निगरानी की रणनीति अपना सकता है।
इस समय आरबीआई के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह आर्थिक वृद्धि को समर्थन भी देता रहे और वित्तीय स्थिरता को भी बनाए रखे। यही संतुलन इस नीति बैठक का सबसे अहम पहलू माना जा रहा है।
लिक्विडिटी, बॉन्ड बाजार और मुद्रा प्रबंधन पर फोकस
इस बार उम्मीद है कि आरबीआई ब्याज दरों से ज्यादा नकदी प्रबंधन और बॉन्ड बाजार को स्थिर रखने पर ध्यान देगा। हाल के महीनों में सरकारी बॉन्ड की यील्ड में बढ़ोतरी देखने को मिली है, जो बाजार के लिए चिंता का विषय रही है।
इसी कारण यह संभावना जताई जा रही है कि केंद्रीय बैंक ओपन मार्केट ऑपरेशंस (ओएमओ) के जरिए सरकारी बॉन्ड की खरीद जारी रख सकता है। यह कदम बाजार में तरलता बनाए रखने और बॉन्ड यील्ड को नियंत्रित रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, ओएमओ ऑपरेशंस की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आरबीआई किन सिक्योरिटीज का चयन करता है। भले ही कुल लिक्विडिटी समान रहे, लेकिन सही बॉन्ड चयन से बाजार स्थिरता पर बड़ा असर पड़ सकता है।
अप्रैल से जून 2026 की तिमाही तक भी बॉन्ड खरीद कार्यक्रम जारी रहने की संभावना जताई जा रही है, जिससे वित्तीय प्रणाली में पर्याप्त नकदी बनी रहे।
भारत के व्यापार समझौते और भविष्य की दिशा
पिछली मौद्रिक नीति के बाद भारत के लिए सबसे बड़ा सकारात्मक बदलाव अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ हुए व्यापार समझौते रहे हैं। इन समझौतों के बाद भारतीय उत्पादों पर लगने वाला शुल्क 50 प्रतिशत से घटकर लगभग 18 प्रतिशत रह गया है।
इस बदलाव का सीधा असर भारतीय निर्यात पर पड़ने की उम्मीद है। कम शुल्क का मतलब है कि भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे। एसबीआई रिसर्च के अनुसार, भारत अब एशिया के उन देशों में शामिल हो गया है जहां आयात शुल्क अपेक्षाकृत कम हैं।
इससे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, निर्यात उद्योग और विदेशी निवेश को मजबूत समर्थन मिलने की संभावना है। आरबीआई के लिए यह सकारात्मक संकेत है, क्योंकि मजबूत निर्यात आर्थिक वृद्धि को गति दे सकता है और चालू खाते के संतुलन को बेहतर बना सकता है।
कुल मिलाकर, इस नीति बैठक में दरों में स्थिरता की उम्मीद है, लेकिन भविष्य के लिए दिए जाने वाले संकेत बेहद महत्वपूर्ण होंगे। आने वाले महीनों में महंगाई, वैश्विक आर्थिक हालात और पूंजी प्रवाह यह तय करेंगे कि आरबीआई आगे दर कटौती करता है या सावधानी बरतते हुए वर्तमान नीति जारी रखता है।
