राज्यसभा में फुट रिफ्लेक्सोलॉजी को आयुष में शामिल करने की मांग
स्वास्थ्य व्यवस्था में एक नए विषय की एंट्री
राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान स्वास्थ्य और वैकल्पिक चिकित्सा से जुड़े एक महत्वपूर्ण विषय ने सबका ध्यान आकर्षित किया, जब मनोनीत सांसद सुधा मूर्ति ने फुट रिफ्लेक्सोलॉजी को आयुष प्रणाली में शामिल करने की सिफारिश की। उन्होंने इसे एक प्रभावी, सुरक्षित और गैर-आक्रामक उपचार पद्धति बताया, जो शरीर के संपूर्ण स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक हो सकती है। सदन में दिए गए अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि मानव शरीर का पैर एक ऐसा अंग है जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है, जबकि इसमें कई ऐसे संवेदनशील बिंदु होते हैं जिनके माध्यम से शरीर के विभिन्न हिस्सों पर सकारात्मक प्रभाव डाला जा सकता है।
उन्होंने इस पद्धति को दर्द कम करने, तनाव घटाने और शरीर को गहरी राहत देने में उपयोगी बताया। उनके अनुसार, आधुनिक जीवनशैली में बढ़ते तनाव और स्वास्थ्य समस्याओं के बीच इस तरह के प्राकृतिक उपचार विकल्पों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इस विषय को सदन में उठाया जाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि भविष्य में वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों पर और अधिक गंभीर चर्चा देखने को मिल सकती है।
दक्षिण-पूर्व एशिया के उदाहरण से दिया तर्क
सुधा मूर्ति ने अपने वक्तव्य में दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां फुट रिफ्लेक्सोलॉजी व्यापक रूप से अपनाई जा चुकी है। थाईलैंड, इंडोनेशिया, लाओस और वियतनाम जैसे देशों में यह न केवल लोकप्रिय है बल्कि इसे एक प्रभावी उपचार पद्धति के रूप में मान्यता भी मिली हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस तरह भारत की पारंपरिक मालिश पद्धतियां विश्वभर में प्रसिद्ध हैं और विदेशी नागरिक इन्हें अपनाने भारत आते हैं, उसी तरह दक्षिण-पूर्व एशिया में लोग फुट रिफ्लेक्सोलॉजी के लिए यात्रा करते हैं।
इस तुलना के माध्यम से उन्होंने यह संकेत दिया कि भारत के पास भी पारंपरिक उपचार पद्धतियों को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की बड़ी संभावनाएं हैं। यदि इसे सही प्रशिक्षण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ विकसित किया जाए, तो यह न केवल स्वास्थ्य सेवा में सहायक हो सकता है बल्कि वेलनेस और मेडिकल टूरिज्म के क्षेत्र में भी नए अवसर पैदा कर सकता है।
आयुष प्रणाली में शामिल करने का प्रस्ताव
सांसद ने यह सुझाव दिया कि आयुष मंत्रालय पहले से ही कई पारंपरिक और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा दे रहा है, इसलिए फुट रिफ्लेक्सोलॉजी को भी इसमें शामिल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इसे आयुष अस्पतालों में उचित प्रशिक्षण, सुरक्षा मानकों और वैज्ञानिक पद्धति के साथ लागू किया जाना चाहिए।
उनका मानना है कि यदि इस पद्धति को संस्थागत रूप दिया जाता है, तो यह स्वास्थ्य सेवाओं को और व्यापक बना सकती है। इससे मरीजों को उपचार के अतिरिक्त विकल्प मिलेंगे और गैर-आक्रामक तरीकों से स्वास्थ्य सुधार की दिशा में काम किया जा सकेगा।
मधुमेह और बुजुर्गों के लिए संभावित लाभ
सुधा मूर्ति ने विशेष रूप से मधुमेह की बढ़ती समस्या पर चिंता जताई और कहा कि भारत में डायबिटीज एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है। मधुमेह से पीड़ित लोगों के पैरों में संवेदनशीलता अधिक होती है और समय पर देखभाल न होने पर गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे में अस्पतालों में फुट केयर और फुट रिफ्लेक्सोलॉजी से जुड़े विशेष विभाग स्थापित करने का सुझाव दिया गया।
उनके अनुसार, इससे शुरुआती स्तर पर समस्याओं की पहचान करना आसान होगा और दर्द को कम करने में मदद मिल सकती है। बुजुर्गों के लिए भी यह एक सुरक्षित और उपयोगी विकल्प साबित हो सकता है, क्योंकि यह पूरी तरह गैर-आक्रामक पद्धति है और इसमें दवाओं पर निर्भरता कम रहती है।
स्वास्थ्य नीति में पैरों की देखभाल को शामिल करने की उनकी अपील इस दिशा में एक नए विचार की शुरुआत मानी जा रही है। यह प्रस्ताव आने वाले समय में वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों पर व्यापक चर्चा और संभावित नीति बदलाव की ओर संकेत करता है।
